Dhar की भोजशाला को लेकर कानूनी और धार्मिक बहस तेज
धार। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद पर हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आज शुक्रवार को एक युगांतकारी फैसला सुनाया है। माननीय उच्च न्यायालय ने पुरातात्विक साक्ष्यों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट को आधार मानते हुए धार की भोजशाला को मूल रूप से वाग्देवी (मां सरस्वती) का मंदिर घोषित किया है। इसके साथ ही अदालत ने हिंदू पक्ष को परिसर के भीतर नियमित पूजा-अर्चना करने की अनुमति भी दे दी है। इस फैसले के आते ही धार शहर के काजी वकार सादिक का बड़ा बयान सामने आया है।
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगा मुस्लिम पक्ष
अदालत के इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए धार के काजी वकार सादिक ने कहा, "हम अदालत के इस आदेश का सम्मान करते हैं। इस पूरे मामले में हमारे वकीलों, जिनमें सलमान खुर्शीद साहब और शोभा मेनन शामिल हैं, उन्होंने कोर्ट के सामने सभी महत्वपूर्ण तथ्य और दलीलें मजबूती से रखी थीं। हम इस फैसले की कानूनी बारीकियों की समीक्षा करेंगे और इसके खिलाफ देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का दरवाजा खटखटाएंगे।"
सुरक्षा के कड़े इंतजाम; भोजशाला का मुख्य द्वार सील
हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आने के तुरंत बाद धार प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद हो गया है। किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना, तनाव या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति से निपटने के लिए भोजशाला परिसर के बाहर भारी मात्रा में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। एहतियात के तौर पर भोजशाला के मुख्य प्रवेश द्वार पर बैरिकेड्स लगाकर उसे फिलहाल आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया है।
अयोध्या मामले की तर्ज पर एएसआई की रिपोर्ट बनी मुख्य आधार
न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल मौखिक दलीलों पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। कोर्ट ने कहा, "हमने एएसआई की विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेजों का गहराई से अध्ययन किया है। इस फैसले तक पहुंचने के लिए 'प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल अवशेष अधिनियम' (ASI Act) के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध अयोध्या मामले के निर्णय को कानूनी आधार माना गया है।"
अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यह ऐतिहासिक और संरक्षित इमारत मूल रूप से देवी सरस्वती का मंदिर ही है।
एएसआई के पास ही रहेगा भोजशाला का प्रबंधन
प्रबंधन को लेकर हाई कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि केंद्र सरकार और एएसआई मिलकर यह तय करें कि भोजशाला मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था कैसी होगी। हालांकि, साल 1958 के कानून के तहत इस पूरी विवादित संपत्ति का मालिकाना हक और देखरेख का अंतिम जिम्मा पूरी तरह से एएसआई (ASI) के हाथों में ही सुरक्षित रहेगा।

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